Balasana 2 क्या है, इसके लाभ एवं सावधानियाँ

बलासन इति किम् २

बालासनः २ यदा एतत् आसनं क्रियते ,साध्यमुद्रा गर्भस्थस्य मानवस्य भ्रूणस्य सदृशी भवति । अतः इस आसन को गर्भासन कहते हैं।

  • अयं आसनः बालासनस्य अपरः विविधता अस्ति ।

इति अपि ज्ञातव्यम्: बाल मुद्रा, शिशु मुद्रा, भ्रूण मुद्रा, बाल आसन, बाला आसन, गर्भ आसन, घरभ आसन, घरभ आसन

इस आसन को कैसे प्रारम्भ करे

  • पद्मासन में बैठने से प्रारम्भ करें .
  • ऊरुयोः मध्ये वत्सयोः च हस्तान् निष्कासयेत्।
  • गण्डयोः अधः विश्रामं कर्तुं हस्तौ भवतः।

इस आसन को कैसे समाप्त करें

  • मुक्त करने के लिए पुनः पद्मासन में आकर आराम करें।

विडियो ट्यूटोरियल

बालासनस्य लाभाः २

शोध के अनुसार यह आसन नीचे के अनुसार सहायक है(YR/1)

  1. यह आसन शूल दर्द, पेट फूलना, आंतशोथ, पुरानी ज्वर, कब्ज आदि रोगों को ठीक करने में सहायक होता है।
  2. इस आसन से पेट के अंगों को ट्रिम रहता है।
  3. गैस-क्लेशं निवारयति, पाचन-शक्तिं वर्धयति च ।
  4. इस आसन के माध्यम से उदर अंग, स्तन एवं बाहों के जोड़ों एवं पैरों का पर्याप्त व्यायाम एवं रोगों का अभाव हो जाता है।
  5. यह आसन वीर्य के संरक्षण में सहायक होता है और मन को आत्मा के साथ साझीदारी होने लगती है।

बालासन करने से पूर्व सावधानी 2

अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार अधोलिखित रोगों में सावधानी ग्रहण की आवश्यकता है(YR/2)

  1. न तु येषां जनानां अतिसारः, गर्भः भवति तेषां कृते।
  2. जानु चोट : गर्भासन से बचना जब तक कि आपको अनुभवी शिक्षक की देखरेख नहीं हो।

अतः, यदि भवतः उपरि उल्लिखितानां समस्यानां कश्चन समस्या अस्ति तर्हि स्वचिकित्सकेन सह परामर्शं कुर्वन्तु।

Histroy एवं योग का वैज्ञानिक आधार

पवित्रलेखानां मौखिकप्रसारणस्य, तस्य शिक्षायाः गोपनीयतायाः च कारणात् योगस्य अतीतं रहस्य-भ्रम-सम्पन्नम् अस्ति । नाजुक ताड़पत्रों पर प्रारम्भिक योग साहित्य दर्ज किया गया था। अतः सहजतया क्षतिग्रस्तं, नष्टं, नष्टं वा अभवत् । योगस्य उत्पत्तिः ५,००० वर्षाणाम् अधिककालं यावत् भवितुं शक्नोति । तथापि अन्ये शिक्षाविदः मन्यन्ते यत् एतत् १०,००० वर्षाणि यावत् पुरातनं भवितुम् अर्हति । योगस्य दीर्घः यशस्वी च इतिहासः चतुर्भिः विशिष्टेषु वृद्धि-अभ्यास-आविष्कार-कालेषु विभक्तः भवेत् ।

  • पूर्व शास्त्रीय योग
  • शास्त्रीय योग
  • उत्तर शास्त्रीय योग
  • आधुनिक योग

योग दार्शनिक स्वरों वाला मनोवैज्ञानिक विज्ञान है। पतंजलि अपनी योग पद्धति का आरंभ करते हैं यह निर्देश देकर कि मन का नियमन अवश्य करना चाहिए – योगाः-चित्त-वृत्ति-निरोधः। सांख्यवेदान्तयोः दृश्यमानानां मनसः नियमनस्य आवश्यकतायाः बौद्धिकमूलाधारेषु पतञ्जलिः न गहनं करोति । योग इति मनसः नियमः, विचार-द्रव्यस्य बाध्यता इति आह । योग व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित एक विज्ञान है। योग का सबसे आवश्यक लाभ यह है कि यह हमें स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक स्थिति बनाए रखने में सहायक होता है।

योगः वृद्धावस्थायाः प्रक्रियां मन्दं कर्तुं साहाय्यं कर्तुं शक्नोति । यतः वृद्धत्वं प्रायः स्वमद्यपानेन वा आत्मविषेण वा आरभ्यते। अतः, वयं शरीरं स्वच्छं, लचीलं, सम्यक् स्नेहनं च कृत्वा कोशिकाक्षयस्य कैटाबोलिक प्रक्रियां पर्याप्ततया सीमितं कर्तुं शक्नुमः। योगासन, प्राणायाम, ध्यान सभी को मिलाकर योग का पूर्ण लाभ प्राप्त करना होगा।

संक्षेपः
बालासन 2 मांसपेशियों की लचीलापन बढ़ाने, शरीर के आकार में सुधार, मानसिक तनाव को कम करने, साथ ही समग्र स्वास्थ्य में सुधार करने में सहायक होता है।