शवासन क्या है, इसके लाभ एवं सावधानियाँ

शवासन इति किम्

शवासनः अनहतचक्रस्य गहनतमस्य शवासनस्य माध्यमेन वयं यथार्थतया सम्पर्कं कर्तुं शक्नुमः।

  • इस आसन में जैसे हम सम्पूर्ण शरीर को भूमि में मुक्त कर गुरुत्वाकर्षण के पूर्ण प्रभाव को अपने माध्यम से प्रवाहित करने देते हैं तब हम वायु तत्व को संयम करते हैं एवं धारण करते हैं।

इति अपि ज्ञातव्यम्: शव मुद्रा, सर्वाधिक आरामदायक मुद्रा, सुपाईन मुद्रा, सवासन, शव आसन, साव आसन, शव मुद्रा, मृत्युासन, मृत्यु, मृत, मृत मुद्रा

इस आसन को कैसे प्रारम्भ करे

  • शववत् पृष्ठे शान्ततया शयनं कुरु।
  • पार्श्वयोः बाहून् आश्रित्य अञ्जलिं च ऊर्ध्वमुखम् ।
  • विचारों से अपने मन को साफ करें।
  • दीर्घकालं गभीरं निःश्वासं गृहीत्वा सम्यक् शिथिलस्थितौ भवतु।

इस आसन को कैसे समाप्त करें

  • दशनिमेषान् यावत् मुद्रायां तिष्ठन्तु ततः मुद्रां मुञ्चन्तु।

विडियो ट्यूटोरियल

शवासन के लाभ

शोध के अनुसार यह आसन नीचे के अनुसार सहायक है(YR/1)

  1. यह आसन शरीर को आराम देता है, मस्तिष्क को शांत करता है तथा तनाव एवं हल्के अवसाद को दूर करने में मदद करता है।
  2. शिरोवेदना, श्रान्तता, अनिद्रा च न्यूनीकरोति ।
  3. रक्तचापं न्यूनीकर्तुं सहायकं भवति ।

शवासन करने से पूर्व सावधानी

अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार अधोलिखित रोगों में सावधानी ग्रहण की आवश्यकता है(YR/2)

  1. पृष्ठ चोट या असुविधा : जानुओं को झुककर पैरों को तल पर रखकर यह मुद्रा करें।
  2. गर्भधारणे बलस्टरस्य उपरि शिरः वक्षः च उत्थापयन्तु ।

अतः, यदि भवतः उपरि उल्लिखितानां समस्यानां कश्चन समस्या अस्ति तर्हि स्वचिकित्सकेन सह परामर्शं कुर्वन्तु।

Histroy एवं योग का वैज्ञानिक आधार

पवित्रलेखानां मौखिकप्रसारणस्य, तस्य शिक्षायाः गोपनीयतायाः च कारणात् योगस्य अतीतं रहस्य-भ्रम-सम्पन्नम् अस्ति । नाजुक ताड़पत्रों पर प्रारम्भिक योग साहित्य दर्ज किया गया था। अतः सहजतया क्षतिग्रस्तं, नष्टं, नष्टं वा अभवत् । योगस्य उत्पत्तिः ५,००० वर्षाणाम् अधिककालं यावत् भवितुं शक्नोति । तथापि अन्ये शिक्षाविदः मन्यन्ते यत् एतत् १०,००० वर्षाणि यावत् पुरातनं भवितुम् अर्हति । योगस्य दीर्घः यशस्वी च इतिहासः चतुर्भिः विशिष्टेषु वृद्धि-अभ्यास-आविष्कार-कालेषु विभक्तः भवेत् ।

  • पूर्व शास्त्रीय योग
  • शास्त्रीय योग
  • उत्तर शास्त्रीय योग
  • आधुनिक योग

योग दार्शनिक स्वरों वाला मनोवैज्ञानिक विज्ञान है। पतंजलि अपनी योग पद्धति का आरंभ करते हैं यह निर्देश देकर कि मन का नियमन अवश्य करना चाहिए – योगाः-चित्त-वृत्ति-निरोधः। सांख्यवेदान्तयोः दृश्यमानानां मनसः नियमनस्य आवश्यकतायाः बौद्धिकमूलाधारेषु पतञ्जलिः न गहनं करोति । योग इति मनसः नियमः, विचार-द्रव्यस्य बाध्यता इति आह । योग व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित एक विज्ञान है। योग का सबसे आवश्यक लाभ यह है कि यह हमें स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक स्थिति बनाए रखने में सहायक होता है।

योगः वृद्धावस्थायाः प्रक्रियां मन्दं कर्तुं साहाय्यं कर्तुं शक्नोति । यतः वृद्धत्वं प्रायः स्वमद्यपानेन वा आत्मविषेण वा आरभ्यते। अतः, वयं शरीरं स्वच्छं, लचीलं, सम्यक् स्नेहनं च कृत्वा कोशिकाक्षयस्य कैटाबोलिक प्रक्रियां पर्याप्ततया सीमितं कर्तुं शक्नुमः। योगासन, प्राणायाम, ध्यान सभी को मिलाकर योग का पूर्ण लाभ प्राप्त करना होगा।

संक्षेपः
शवासन मांसपेशियों की लचीलापन बढ़ाने में सहायक होता है, शरीर के आकार में सुधार करता है, मानसिक तनाव को कम करता है, साथ ही समग्र स्वास्थ्य में सुधार करता है।