अर्धचन्द्रासन 2 क्या है, इसके लाभ एवं सावधानियाँ

अर्धचन्द्रासन इति किम् २

अर्धचन्द्रासनः २ यह आसन उष्ट्रासन (The camel pose) के समान है। यह आसन अर्ध-चन्द्रासन का अपर रूप है।

इति अपि ज्ञातव्यम्: अर्धचन्द्र मुद्रा 2, अर्धचन्द्र आसन, अधा चन्दर आसन

इस आसन को कैसे प्रारम्भ करे

  • उष्ट्रासन (ऊंट मुद्रा) से प्रारम्भ करें , जानु पर खड़ा होकर दोनों हाथों को वक्षःस्थल पर रखें।
  • निःश्वासं कृत्वा कण्ठं शिरः च पृष्ठतः नेतुम् एवं कुर्वन् अग्रे कटिक्षेत्रं अग्रे नेतुम्।

इस आसन को कैसे समाप्त करें

  • कुछ समय तक स्थिति में रहें फिर मुद्रा को मुक्त कर आरामदायक मुद्रा में आराम करें।

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अर्धचन्द्रासन के लाभ 2

शोध के अनुसार यह आसन नीचे के अनुसार सहायक है(YR/1)

  1. इस आसन से ऊर्ध्व और कनिष्ठ ऊरु एवं जानु तक फैलता है।
  2. इस आसन से सम्पूर्ण मेरुदण्ड एवं श्रोणि को ताप देता है।
  3. गभीरतरं श्वसनस्य अनुमतिं दत्त्वा वक्षःस्थलं उद्घाटयिष्यति।
  4. फोकस बिन्दु मेरुदण्ड है।

अर्धचन्द्रासन करने से पूर्व सावधानी 2

अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार अधोलिखित रोगों में सावधानी ग्रहण की आवश्यकता है(YR/2)

  1. न तु येषां व्यक्तिनां हर्निया, अद्यतनं वा दीर्घकालीनं वा जानु, स्कन्धः, कण्ठः वा पृष्ठक्षतिः वा शोथः वा भवति ।

अतः, यदि भवतः उपरि उल्लिखितानां समस्यानां कश्चन समस्या अस्ति तर्हि स्वचिकित्सकेन सह परामर्शं कुर्वन्तु।

Histroy एवं योग का वैज्ञानिक आधार

पवित्रलेखानां मौखिकप्रसारणस्य, तस्य शिक्षायाः गोपनीयतायाः च कारणात् योगस्य अतीतं रहस्य-भ्रम-सम्पन्नम् अस्ति । नाजुक ताड़पत्रों पर प्रारम्भिक योग साहित्य दर्ज किया गया था। अतः सहजतया क्षतिग्रस्तं, नष्टं, नष्टं वा अभवत् । योगस्य उत्पत्तिः ५,००० वर्षाणाम् अधिककालं यावत् भवितुं शक्नोति । तथापि अन्ये शिक्षाविदः मन्यन्ते यत् एतत् १०,००० वर्षाणि यावत् पुरातनं भवितुम् अर्हति । योगस्य दीर्घः यशस्वी च इतिहासः चतुर्भिः विशिष्टेषु वृद्धि-अभ्यास-आविष्कार-कालेषु विभक्तः भवेत् ।

  • पूर्व शास्त्रीय योग
  • शास्त्रीय योग
  • उत्तर शास्त्रीय योग
  • आधुनिक योग

योग दार्शनिक स्वरों वाला मनोवैज्ञानिक विज्ञान है। पतंजलि अपनी योग पद्धति का आरंभ करते हैं यह निर्देश देकर कि मन का नियमन अवश्य करना चाहिए – योगाः-चित्त-वृत्ति-निरोधः। सांख्यवेदान्तयोः दृश्यमानानां मनसः नियमनस्य आवश्यकतायाः बौद्धिकमूलाधारेषु पतञ्जलिः न गहनं करोति । योग इति मनसः नियमः, विचार-द्रव्यस्य बाध्यता इति आह । योग व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित एक विज्ञान है। योग का सबसे आवश्यक लाभ यह है कि यह हमें स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक स्थिति बनाए रखने में सहायक होता है।

योगः वृद्धावस्थायाः प्रक्रियां मन्दं कर्तुं साहाय्यं कर्तुं शक्नोति । यतः वृद्धत्वं प्रायः स्वमद्यपानेन वा आत्मविषेण वा आरभ्यते। अतः, वयं शरीरं स्वच्छं, लचीलं, सम्यक् स्नेहनं च कृत्वा कोशिकाक्षयस्य कैटाबोलिक प्रक्रियां पर्याप्ततया सीमितं कर्तुं शक्नुमः। योगासन, प्राणायाम, ध्यान सभी को मिलाकर योग का पूर्ण लाभ प्राप्त करना होगा।

संक्षेपः
अर्धचन्द्रासन 2 मांसपेशियों की लचीलापन बढ़ाने, शरीर के आकार में सुधार, मानसिक तनाव को कम करने, साथ ही समग्र स्वास्थ्य में सुधार करने में सहायक होता है।